

प्रथम पुरुष अन्य पुरुष
(कोएट्जी के उपन्यासों में आत्म के अन्य संस्करण)
जे एम कोएट्जी के कथासत्य की पड़ताल उनके यहां आत्म-अन्य संबंध के परिप्रेक्ष्य की उपेक्षा कर नहीं की जा सकती। कोएट्जी के यहां आत्म ही आलंबन है, किंतु यह निरपेक्ष आत्म नहीं है। यह अनन्य आत्म भी नहीं है। यह अन्य के अनिवार्य परिप्रेक्ष्य में आत्म की छवि है या आत्म की छवियां हैं।
जेएम कोएट्जी के यहां आत्म के अन्य और अनेक संस्करण हैं।
उनके यहां आत्म 'अन्यवत' और अन्य 'आत्मवत' है।
उनके कथानायकों का आत्म-क्षोभ ही उन्हें अन्य-क्षम बनाता है।
कोएट्जी अपने उपन्यासों में जिस अनवरत तनाव की सर्जना करते हैं, जितने प्रतिफलन और सरणियां वे रचते हैं, कह सकते हैं उसका मूल भी उनके इसी अवबोध में है।
आत्म के आलोकन के दो रास्ते हो सकते हैं। एक तो प्रत्यक्ष या पदार्थ के स्तर पर, दूसरा अप्रत्यक्ष या तत्व के स्तर पर। और अगर आत्म को जीरो पॉइंट मानें तो उसकी भीति के इधर और उधर भी दो अलग-अलग रास्ते हो सकते हैं। एक रास्ता वह है, जहां आत्म इतना व्यापक हो जाता है, वामन से विराट की तरह, कि समूची सृष्टि उसमें समाहित हो सकती है। उपनिषदों और ब्रह्मसूत्र का आत्म यही है - अहं ब्रह्म - जहां वयष्टि ही समष्टि में परिवर्तित हो जाता है। वास्तव में आत्म की यह स्फीति आत्म से निवृत्ति का ही उपाय है। यह ऋषियों की रीति है।
दूसरी रीति रचनाकारों की है, जो कि आत्म के ब्रह्म नहीं, द्विज हैं। वे आत्म पर संकेंद्रित और संगुम्फित होते हैं। वे समष्टि को समेटकर वयष्टि पर एकाग्र कर लेते हैं और विराट को एक बिंदु पर। शायद आत्म के बोध की इस पीड़ा से संतप्त होकर ही काफ्का ने कहा था कि हमें नीचे से ऊपर की ओर नहीं, बल्कि भीतर से बाहर की ओर उगना चाहिए।
कोएट्जी इसी परंपरा के रचनाकार हैं। लेकिन प्रश्न उठता है कि युद्धोत्तर वर्षों में पश्चिम में जिस आधुनिकता का सूत्रपात हुआ और बीइंग और सेल्फ के जितने आविष्कार किए गए, उनसे कोएट्जी का यह आत्मबोध किन अर्थों में पृथक है।
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अस्तित्ववाद के नवभाष्यकार-सिद्धांतकार ज्यां पॉल सार्त्र ने अन्य के अस्तित्व की उपेक्षा की थी। उन्होंने अपने आत्म की प्रतिष्ठा इसी शर्त पर की थी कि अन्य का अस्तित्व अवांछित है। द अदर इज हेल। कोएट्जी इस स्थापना में क्षेपक की तरह प्रवेश करते हैं। वे अन्य को नहीं नकारते। नकार नहीं सकते। वास्तव में उनके यहां आत्म का जो बोध है, वह अनिवार्यत: अन्य के परिप्रेक्ष्यों से निर्मित होता है। कोएट्जी के कथाकार के लिए अन्य आत्म की ही एक प्रतिछवि है और वे अपनी अनेक प्रतिछवियां रच देना चाहते हैं। कोएट्जी अपनी कथाकृतियों के माध्यम से अपने लिए 'आल्टर ईगो' की एक शृंखला तैयार करते हैं। ये उनके 'काउंटर सेल्फ' हैं। उनके लिए आत्म तक पहुंचने का रास्ता अनिवार्यत: अन्य से होकर जाता है और एक बिंदु आता है, जब आत्म ही अन्य हो जाता है। यह आत्म स्फीति का विपर्यय है, लेकिन एक दूसरे स्तर पर, विखंडन के स्तर पर यह आत्म का विस्तार भी है।
सिमोन वेल ने कहा था : डिस्टेंस इज द सोल ऑफ ब्यूटी। कोएट्जी इसी डिस्टेंस का रियाज करते हैं। अपने फिक्शनलाइज्ड मेमॉयर्स की पहली दो किताबों बॉयहुड और यूथ में वे प्रथम पुरुष का निषेध करते हैं। वे स्वयं को अन्य के स्थान पर स्थापित करते हैं। तीसरी किताब समरटाइम में वे एक अन्य का भी निषेध कर देते हैं और सीधे-सीधे आत्म की अनेक प्रतिछवियों में विभक्त हो जाते हैं। कोएट्जी का एस्ट्रैंजमेंट ठीक इन्हीं मायनों में अस्तित्ववाद से पृथक है कि वह एक जनाकीर्ण एस्ट्रैंजमेंट है। वह एक अन्यबहुल एस्ट्रैंजमेंट है।
फ्रेडरिक नीत्शे ने कहा था कि मैं न केवल अपनी बल्कि अन्यों की चेतना को भी धारण करता हूं। समरटाइम पढ़ते समय नीत्शे की वह उक्ति बार-बार याद आती है। यहां कोएट्जी अन्य की चेतना में पैठ गए हैं, लेकिन वह अन्य वास्तव में आत्म की ही एक और लीलाभूमि है। समरटाइम में कोएट्जी अपने क्राफ्ट के शिखर पर हैं। यहां उनका आत्मक्षोभ चरम पर है और आत्मरति भी, ठीक वैसे ही जैसे माइकल के में उनका आत्मत्याग और अदम्य जीजिविषा।
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और इसीलिए यह अकारण नहीं है कि कोएट्जी के यहां प्रेम और सेक्स की समस्यामूलक उपस्थिति है। (डिस्ग्रेस की प्रारंभिक पंक्तियां हैं : 'उसे लगता था कि उसने सेक्स की 'समस्या' का समाधान खोज लिया है')। प्रेम और सेक्स में आत्म और अन्य के संबंधों की जितनी जटिल उपस्थिति है, उतनी किसी और संबंध में नहीं है। कोएट्जी इन जटिलताओं के तमाम आयामों को एक अनन्य रचनात्मक साहस के साथ आलोकित करते हैं। वे मनोग्रंथियों को सहलाते हैं और उन्हें डिकोड की प्रक्रिया में नई ग्रंथियां निर्मित करते हैं। उनके यहां आलाप में गिरह पड़ी है।
एक अर्थ में सेक्स आत्म की ही व्याप्ति या आत्म की संभावनाओं का पुनर्सीमन है, लेकिन उसके साथ 'समस्या' यह है कि वह अन्य के अनिवार्य परिप्रेक्ष्य में ही संभव है। वह अन्य की देह में आत्म का एक्सटेंशन है। वह अनिवार्यत: अन्य आश्रित या अन्योन्याश्रित है। वह सुख का एकालाप है, लेकिन वह एक समवेत में अलग-थलग पड़ता स्वर भी है। उसमें निर्बंध और बाध्य, मुक्त और कीलित की सह-उपस्थिति है।
ऐतिहासिक दर्शनों में वर्ग संघर्षों की बात कही गई है। युद्धोत्तर वैचारिकी ने सभ्यता के संघर्षों का बखान किया है। लेकिन वास्तव में सबसे बड़ा संघर्ष धारणाओं और प्रत्ययों का है। क्लैश ऑफ पर्सेप्शंस। दूसरे शब्दों में क्लैश विद अदर्स। लेकिन अस्तित्ववादी दर्शन के अन्यद्रोह में कोएट्जी का योग यही है कि उन्होंने स्पष्ट कर दिया था : आत्म भी अन्य है।
समरटाइम में एक प्रसंग है। जॉन की डेट है। वह गर्लफ्रैंड के यहां पहुंचता है। लेकिन वह अपने साथ में कंडोम के साथ ही शूबर्ट की एक कॉम्पैक्ट डिस्क भी लेकर आया है। वह उसे प्ले करता है और गर्लफ्रैंड से अनुरोध करता है कि वे संगीत की लय पर संभोग करें। वह स्पष्टीकरण देता है कि हर संगीत स्मृति का संगीत है, क्योंकि संगीत के नोटेशंस में एक मृत सदी के संवेग जीवित हैं। उन नोट्स को सहलाने का अर्थ होगा प्रेम और आवेग को एक अबाध आयु प्रदान करना। उसकी गर्लफ्रैंड इस फलसफे से टर्न ऑफ हो जाती है। समरटाइम में वह फस्र्ट पर्सन में है और जॉन थर्ड पर्सन भी नहीं। जॉन आग्रहपूर्वक कहता है : संगीत की लय को महसूस करो। वह झल्लाकर कहती है : इससे बदतर कुछ नहीं हो सकता कि आपको यह बताया जाए कि इंटरकोर्स के दौरान क्या अनुभव करना चाहिए!
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कोएट्जी के यहां इतिहास ही नियति है। उनका इतिहासबोध इतना सघन है कि वह उनके प्रस्तुत और आगत की संभावनाओं को नष्ट करता है। एक अर्थ में उनका इतिहास उनकी कल्पनाओं का संहारक भी है। कोएट्जी के कथाकार के पास कोई आगत नहीं है। केवल एक इतिहास है और इतिहासदग्ध स्मृति है।
डायरी ऑफ अ बैड ईयर में जब वे व्यक्ति और राज्यसत्ता के अंतर्संबंधों पर बात करते हैं तो वे तंत्र को अपनी त्वचा बना लेते हैं। कोएट्जी के यहां किसी भी संज्ञा और स्थिति को आत्म के आरोप से मुक्ति नहीं। राज्यसत्ता के अतिचारों को वे एक पर्सनल डिस्ग्रेस कहते हैं। होलोकॉस्ट के अपराध बोध को जर्मनों ने जिस तरह अपनी आत्मा की खोह में हमेशा के लिए सुरक्षित कर लिया है, उसे कोएट्जी एक मूल्य मानते हैं। वे इसका अनुकरण करते हैं। वास्तव में उनका देशच्युत होना भी इसी का एक रूपक है। राज्यसत्ता देश है और इतिहास के अलावा और कोई शरण नहीं। कोएट्जी का देशच्युत होना वास्तव में उपस्थितियों का गहरा नकार है।
और इसीलिए, यह भी अकारण नहीं है कि कोएट्जी के कथानायक देश और काल में एक साथ प्रतिगामी होते नजर आते हैं। वे एक साथ अतीतव्याकुल और देशच्युत हो सकते हैं। माइकेल के से लेकर डिस्ग्रेस और समरटाइम तक कोएट्जी के किरदार निरंतर पलायन करते हैं। उनमें एक किस्म का श्रम-रोमान है। वे मैनुअल लेबर की जरूरत पर बहस करते हैं। वे अपने हाथों अपने घर में रिनोवेशन करते हैं, गार्डनिंग करते हैं, खीरों और खरबूजों की खेती करते हैं। वे उपनगरों को छोड़कर पथरीले प्रोविंसों में लौट आते हैं। बैक टु द कंट्री। प्रतिगामिता की यह प्रवृत्ति साहित्य और चिंतन में नई नहीं है, लेकिन यह कोएट्जी का तीखा इतिहासबोध ही है, जो उन्हें रस्किन, थोरो, एमर्सन और टॉल्सटाय के अतीत-रोमान से अलगाता है।
जुरगेन हेबरमास के कृतित्व को 'आधुनिकता पर एक असमाप्त बहस' कहा गया है। कोएट्जी के यहां आधुनिकता के साथ ही सभ्यता पर भी एक असमाप्त जिरह है। वे जिरहधर्मी और आर्गुमेंटेटिव हैं। डायरी ऑफ अ बैड ईयर वास्तव में एक लंबी बहस है। एक प्रलंबित विवादी स्वर।
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आरोह और अवरोह, चलना और लौटना। ध्यान रखा जाना चाहिए कि माइकल के का सबसे बड़ा संघर्ष केवल शहरों और शिविरों से पलायन कर जाने का ही नहीं है, उसका संघर्ष यह भी है कि क्रांति के नाम पर मनुष्यता को कुचलने वाली शक्तियों और सत्ता के असंख्य प्रतिरूपों के बीच वह अपने आत्मनिर्वासन के विवश प्रतिरोध को कैसे सुरक्षित रख सकता है। वह अपनी प्रासंगिकता के लिए भी संघर्षरत है और इसीलिए वह हर एकांत से लौटकर आता है। उसने आत्म-निर्वासन चुना है, लेकिन उसने विस्थापन को अपनी नियति नहीं स्वीकारा है। कोएट्जी अपने और अपने कथाचरित्रों के लिए प्रतिरोध की अनेक भंगिमाएं और सूक्ष्म संकेत आविष्कृत करते हैं, किंतु यही उनका अस्तित्व और उपस्थिति भी है।
डायरी ऑफ अ बैड ईयर में संगठित सत्ता के चरित्र पर टिप्पणी है। इसकी आवृत्ति उनकी अगली किताब समरटाइम में सुनाई देती है, जहां जॉन कोएट्जी अराजकतावादी होने का जोखिम उठाते हुए कहता है कि राजनीति और राज्यसत्ता का उन्मूलन आवश्यक है।
राजनीति का निषेध उसकी राजनीति है, प्रतिरोध का निषेध उसका प्रतिरोध है ('नथिंग इज वर्थ फाइटिंग फॉर')। माइकल के में यह इतिहास का त्याग है तो डिस्ग्रेस में यह नियति से निवृत्ति ('आई एम गिविंग इट अप')। कोएट्जी के यहां दोस्तोएव्स्की और काफ्का के 'लघुनायकों' की उत्तरपरंपरा है। माइकल के सिंपलटन है तो जॉन 'कॉमिको-सेंटीमेंटल'। डिस्ग्रेस में डेविड ल्यूरी के हाथ से ऐतिहासिक विकासक्रम के सूत्र छूटते चले जाते हैं। वह घुटनों पर झुककर अपने अपराधों के लिए क्षमायाचना करता है और अपनी नियति को अंगीकार करता है ('लाइक अ डॉग')
यह काउंटर-पर्सपेक्टिव, जिसे कोएट्जी निरंतर विरूपित भी करते रहते हैं, वास्तव में उनके रचनाकार का एक डिफेंस मैकेनिज्म है और यह इतना सूक्ष्म है कि इसे सिरे से चूक जाना बहुत संभव है।
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[ सुशोभित हिंदी के युवा कवि-लेखक हैं। अपवाद पर किताबों और लेखकी पर नियमित लिख रहे हैं। ]



3 comments:
जे एम कोएट्जी के उपन्यासों में आत्म-अन्य संबंध का गहन विश्लेषण करने वाला लेख.रचनाकार के इतिहास बोध और प्रतिगामिता के सिद्धांत को अनेक उदाहरणों के साथ रेखांकित किया गया है.उनके लगभग सभी उपन्यासों की विषयवस्तु और नायकों पर सटीक टिप्पणियां की गयी हैं.
सुशोभित को बधाई, निरंतर आलोचनात्मक गद्य लिखने के लिए. धन्यवाद भी.
“....सबसे बड़ा संकट चयन और अ-चयन का है.” लेखक ने यह एक अनिवार्य पंक्ति लिखी है. हिन्दी में यह क्राईसिस अपने चरम पर है. अलग दिखने के नाम पर लेखकगण कुछ भी लिखने के लिए तैयार है. वो ईश्वर और ' नरेंद्र मोहन' तक को जस्टीफाई करने और उनसे होड़ लेने के लिए तैयार है.
डिसग्रेस पर लेखक की स्थापना से विनम्र असहमति : अपनी बनावट में गिविंग-इट-अप जैसा दिखता यह उपन्यास दरअसल ‘इन हैबिट ऑफ बीईंग एक्टर्स / प्लेयर्स ( समटाईम्स बीईंग गॉड)’ से ‘ किंकर्त्वयविमूढ़ दर्शक’ में तब्दील हो जाने की बात है. जिन घटनाओं के सहारे जे.एम.,डिसग्रेस लिखते हैं, उन्हीं घटनाओं के आस पास नादिन गोर्डाईमर लिखती हैं. हू-ब-हू घटनाएँ नहीं मिलती पर उसमें साम्य है, फर्क जो है बस इतना है कि नादिन के दर्शक पात्र अश्वेत हैं और जे. एम. ने श्वेत दर्शकों की बात लिखी है. यह मेरी हेठी ही समझी जायेगी अगर कहूँ कि जे.एम. से जाने अनजाने एक गलती हुई है, पर सत्य यही है. गिविंग-इट-अप का पाठ, इस उपन्यास को श्वेत / अश्वेत के रक्तरंजित अतीत से काट कर देखना है.
सत्ता परिवर्तन के दौरान या सत्ता जब अपने आप को स्थापित करती है, उस समय जो हड़बोंग मचती है, उसे जे.एम. ने स्थाई मान दिया है. जबकि इससे उलट नादिन सत्ता के लगभग सत्य की तरह स्थापित हो जाने के बाद की बात लिखती हैं. सत्ता परिवर्तन दौरान के इन खराब कारनामों को अपने तईं चिनुआ अचेबे ने खूब जगह दी है. जाहिर सी बात है, जब रचनाकार अलग है तो प्रस्तुति भी, टोन भी, लेकिन मूल वही है.
दरअसल जे.एम. अपने इस उपन्यास की राजनीतिक संरचना में वी.एस. के ‘अ बेंड इन द रिवर’ के करीब चले गए हैं. वी.एस., अपने नॉन फिक्शन की तरह, फिक्शन में भी, अच्छे गद्य के बावजूद, निर्णय सुनाने की हड़बड़ी में रहते हैं.
चंदनजी, इस लेख पर सदाशयतापूर्वक टिप्पणी करने के लिए धन्यवाद। यह एक संयोग ही है कि मैंने नायपॉल का 'अ बेंड इन द रिवर' और कोएटजी का 'डिस्ग्रेस' एक के बाद एक पढे थे, लेकिन मुझे कहीं भी कोई साम्य नहीं सूझा था। आपकी टिप्पणी के बाद पुन: उस पर विचार किया।
देखिए, अगर हम परिवर्तन की ऐतिहासिक प्रक्रियाओं की बात करते हैं, तो वह एक सामान्य कथाभूमि होगी, लेकिन किसी भी बड़े लेखक के यहां सवाल सामान्य कथाभूमियों से अधिक विशिष्ट भावभूमि और दष्िटकोण का होता है। विशिष्ट विखंडन का पाथेय है। मेरे विचार से नायपॉल और कोएटजी के रचनात्मक पूर्वग्रहों में उतना ही अंतर है, जितना उत्तर औपनिवेशिक और उत्तर आधुनिक वैचारिकियों में होगा। वहीं शिल्प के स्तर पर उन दोनों में उतना ही अंतर है, जितना कि स्फीति और प्रिसिजन में होगा। दोनों उपन्यासों में राजनीतिक तनाव है, लेकिन 'डिस्ग्रेस', जैसा मैंने पढ़ा, ऐतिहासिक के साथ ही नैतिक और अधिभौतिक संकटों का भी आख्यान है। नायपॉल के उपन्यास में ये तत्व नहीं दिखते।
'डिस्ग्रेस' की तेरेसा याद आती है? बायरन की कथानायिका, जिसे डेविड ल्यूरी एक ओपेरा में पुनर्जीवित कर देना चाहता है, लेकिन ऐसा वह कर नहीं पाता। वास्तव में डेविड ल्यूरी के क्राइसिस के कई स्तर हैं। उसमें नैतिक क्षोभ है, ऐतिहासिक विकासक्रमों में अप्रासंगिक हो जाने का दंश है, नियति के अंत की पीड़ा है और अंत से पहले वाले, तेइसवें अध्याय में, वह अपनी काल्पनिक म्यूज तेरेसा से भी क्षमायाचना करता है कि उसने उसे पुनर्जीवन का वचन दिया था, लेकिन अब वह उसकी मुक्ति के लिए कुछ नहीं कर पा रहा। क्या यह तेरेसा उस मेलनी का ही अप्रस्तुत रूप नहीं है, जिसे उसने एक वचन दिया था, लेकिन अंतत: जिसे उसने केवल छला? क्या यहां डेविड ल्यूरी अनेक नियतियों का धारक नहीं है?
ये तेरेसा कौन है? क्या ये अजीब बात नहीं कि कोएटजी के आल्टर ईगो की कडि़यों में कितनी स्त्रियां भी सम्मिलित हैं। तेरेसा है, एलिजाबेथ कोस्तेलो है, समरटाइम में तो एक को छोड़ सभी आख्यायक स्त्रियां ही हैं।
डिस्ग्रेस ने अपने समय में जो उथल-पुथल मचाई थी, उसके लिए उसमें अनुस्यूत श्वेत-अश्वेत राजनीतिक विमर्श का बहुत बड़ा योग था, इसमें संदेह नहीं, लेकिन यह हमारा दायित्व है कि हम किसी रचना के प्रचलित मानकों से पलायन करते हुए उसके अनुपस्थित पाठों की यात्रा करें।
आपने कहा है कि सत्ता परिवर्तन के समय मचने वाली हड़बोंग को जे एम ने स्थायी मान दिया है। वास्तव में हमें संक्रमण के मानकों पर विचार करना चाहिए। कोएटजी सत्ता के चरित्र पर बात करते हैं और सत्ता का चरित्र संक्रमण काल में ही नहीं, हर काल में एक-सा रहता है। काफका का उदाहरण लें। वे जब लिख रहे थे, तब तो फासिज्म का भी उदय नहीं हुआ था, जनरल फ्रांको की सत्ता के अतिचार भी एक दशक दूर थे, होलोकॉस्ट भविष्य की गर्त में था, लेकिन इसके बावजूद काफका अपने लेखन में, ट्रायल, पेनल कॉलोनी और कासल में, व्यक्ति-सत्ता संबंधों के जिस संकट का सामना करते हैं, उसका हम ऐतिहासिक पाठ कैसे करेंगे? क्या यह आश्चर्यजनक नहीं कि इमरे कर्तेश जैसे होलोकॉस्ट लेखक अपने कथासत्य के लिए बार-बार काफका जैसे लेखक की ओर पलटकर देखते हैं, जो न केवल उन्हें उपलब्ध इतिहास से वंचित है, बल्कि उनकी नियति में भी उनकी कोई सहभागिता नहीं है।
कर्तेश का समस्त उपस्थित काफका के समस्त अनुपस्थित से अनुप्राणित होता है।
चंदनजी, आपने यह लेख पढ़ने के बाद जो विचारपूर्ण और प्रासंगिक टिप्पणी की, उसके लिए एक बार पुन: धन्यवाद। आपकी आगामी रचनात्मक और वैचारिक यात्राओं के लिए शुभकामनाएं।
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